दिल्‍ली-एनसीआर

मध्य प्रदेश में तैयार हुआ आदिवासियों का धांसू म्यूजियम, 15 नवंबर को प्रधानमंत्री मोदी करेंगे लोकार्पण.

दिल्‍ली: बादलभोई आदिवासी राज्य संग्रहालय का नया भवन इस समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथों उद्घाटन के लिए सज-संवर रहा है. इस भवन में स्वतंत्रता संग्राम के आदिवासी नायकों के योगदान को विशेष रूप से चित्रांकित किया गया है. संग्रहालय में आदिवासी कलाकृतियों और संस्कृति को दीवार पर उकेरा गया है. ट्राइबल रिचर्स इंस्टीट्यूट भोपाल की टीम की मॉनिटरिंग में इसका कायाकल्प किया जा रहा है.

म्यूजियम की दीवारों पर टंट्या भील, भीमा नायक, शंकर-शाह रघुनाथ शाह, रघुनाथ सिंह मंडलोई, राजा गंगाधर गोंड, बादल भोई और गंजन कोरकू, खज्या नायक, सीताराम कंवर, ढिल्लन शाह गोंड मालगुजार, राजा अर्जुन सिंह गोंड, राजा गंगाधर गोंड की गाथा नजर आती है. इसके अलावा बांस शिल्प, लौह शिल्प, मृदा शिल्प और पेंटिंग के माध्यम से स्वतंत्रता सेनानियों के कार्य को प्रदर्शित किया गया है. इस समय संग्रहालय में मौजूद टीआरआई के अधिकारी बता रहे हैं कि इस संग्रहालय का उद्घाटन 15 नवम्बर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वर्चुअली कर सकते हैं. इसके लिए यह तैयारी की जा रही है.

संग्रहालय में आदिवासी जनजाति बैगा, गोंड, भारिया समेत अन्य जन जातियों की जीवन शैली, सांस्कृतिक धरोहर, प्रतीक चिन्हों और शिल्पों का प्रदर्शन किया गया है. उनके चिलम, बैलगाड़ी, गुल्ली का तेल निकालने का यंत्र, वाद्य यंत्र जैसे- ढोलक, इकतारा, मृदंग, टिमकी, चटकुले, पानी पीने का तुम्बा, आटा पीसने की चकिया, घट्टी, उडिया खेती, पातालकोट, कपड़े, जूते, रस्सी, घुरलु की छाल, मछली पकड़ने से संबंधित उपकरण झिटके, बूटी, मोरपंख का ढाल, मेला, झंडा (जेरी) लगाना, मदिरा निर्माण, कडरकी, चन्दरहार, हमेर जेवर, कोरकू जनजाति का मरोणपरांत स्तम्भ, लोह निर्माण और मेघनाथ के प्रदर्शन के जीवंत दृश्य वास्तविक जैसे दिखते हैं.

20 अप्रैल 1954 को छिंदवाड़ा में शुरू किए गए ट्राइबल म्यूजियम को वर्ष 1975 में स्टेट म्यूजियम का दर्जा मिला था और 8 सितंबर 1997 को ट्राइबल म्यूजियम का नाम बदलकर श्री बादल भोई स्टेट ट्राइबल म्यूजियम कर दिया गया. 10 अप्रैल 1965 को संस्था का मुख्यालय भोपाल के श्यामला हिल्स में शिफ्ट कर दिया गया लेकिन संग्रहालय छिंदवाड़ा में ही रखा गया. इसलिए मध्य प्रदेश का पहला जनजातीय संग्रहालय यहीं बनाया गया है.

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