जितेन्द्र बच्चन
दिल्ली: क्रांतिकारियों का सर्वोत्तम हथियार रही है हिन्दी पत्रकारिता. सरकार और जनता के बीच इससे बेहतर और कोई सेतु काम नहीं करता. आज भी देश में सबसे अधिक हिंदी भाषा में ही समाचार पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होते हैं और न्यूज चैनल भी सबसे ज्यादा हैं. जन सरोकार से जुड़ी, किसान, मजदूर, शिक्षित वर्ग और आम आदमी की बुलंद आवाज है हिंदी पत्रकारिता. इसके बावजूद हिंदी पत्रकारिता की वह धमक अब नहीं रही जो अंग्रेजी पट्टी के अखबारों या मैग्जींस की दिखती है. इसका मुख्य कारण है सरकारी उपेक्षा! आज अपने ही देश में हिंदी पत्रकारिता दोयम दर्जे की बन चुकी है और अब तो दिन-प्रतिदिन इसकी साख भी गिरती जा रही है.
हिंदी पत्रकारिता करने वाले 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस पर दूसरी भाषाओं को खूब कोसते हैं, लेकिन यही कोसने वाले लोग हिंदी के पत्रकारों को नौकरी नहीं देना चाहते. हिंदी पत्रकारिता के नाम पर पत्रकार और सरकार बड़े-बड़े आयोजन करते हैं, लेकिन शोहरत अंग्रेजी के एडीटरों के खाते में जाती है. अंग्रेजी पत्रकारिता के दम पर बड़े-बड़े मीडिया घराने सत्ता से नजदीकियां बनाकर मलाई काट रहे हैं. जबकि हिंदी के पत्रकारों को केंद्र व राज्य सरकार के अधिकारी नजदीक भी नहीं फटकने देते. राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा जारी किए जाने वाले विज्ञापनों में अक्सर अंग्रेजी के बड़े अखबारों को प्राथमिकता दी जाती है। क्षेत्रीय और हिंदी के छोटे समाचार पत्रों को कम विज्ञापन या कम दरें मिलती हैं, जिससे उनका आर्थिक ढांचा चरमरा गया है। इसी उपेक्षा के चलते हिंदी के तमाम पत्र-पत्रिकाएं बंद हो चुके हैं या फिर अंतिम सांसें ले रहे हैं.
छोटे कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले हिंदी पत्रकारों को नियमित वेतन, स्वास्थ्य बीमा या सरकारी सुरक्षा का लाभ नहीं मिलता. वे अक्सर स्थानीय प्रशासन और माफिया के निशाने पर होते हैं. कई राज्यों में हिंदी पत्रकारों को सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त करने में अत्यधिक नौकरशाही का सामना करना पड़ता है, जिससे उन्हें प्रेस सुविधाओं से वंचित रखा जाता है. हिंदी पत्रकारों को अक्सर सरकारी विभागों से डेटा या आधिकारिक जानकारी प्राप्त करने में उपेक्षा का सामना करना पड़ता है. सरकार की इस उदासीनता के कारण जमीनी स्तर की सच्ची खबरें कई बार मुख्यधारा से गायब हो जाती हैं और मीडिया संस्थानों या पत्रकारों को अपना खर्च निकालने के लिए प्रायोजित खबरों पर मजबूर होना पड़ता है.
किसी सार्वजनिक बड़े मंच पर जब किसी पत्रकार को स्थान देना होगा या संवाद में हिस्सा लेना होता है तो अंग्रेजी वाले साहब को अहमियत दी जाती है. बहुत से ऐसे पत्रकार हैं जिन्हें हिंदी का अच्छा ज्ञान है. उनका अनुभव बोलता है लेकिन अंग्रेजी में कमजोर होने के नाते सरकारी अधिकारी उन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं. उनको महत्व देने के बजाय उनका माखौल उड़ाया जाता है. हिंदी पत्रकारिता करने वालों को दलाल और चापलूस तब बताया जाता है. कितनी अजीब विडंबना है कि अपने ही देश में हिंदी पत्रकारिता आज अनाथ जैसी हालत में है. इसकी वकालत करने वाले को कम पढ़ा-लिखा समझा जाता है.
हिंदी चैनलों और हिंदी समाचार पत्र–पत्रिकाओं की बदौलत कई राजनेता, व्यापारी व अभिनेता आसमान छू रहे हैं. ताकतवर बने हुए हैं, लेकिन जब क्रेडिट देने की बात आती है तो हिंदी पत्रकारों को भूलकर अंग्रेजी के चैनलों व अखबारों की पूजा की जाती है. और अब तो हिंदी पत्रकारिता के आगे विश्वसनीयता का संकट भी खड़ा हो चुका है. सोशल मीडिया के इस दौर में अफवाहों और फर्जी खबरों की बाढ़-सी आ गई है. अंग्रेजी वाली ब्रेकिंग न्यूज (सबसे पहले खबर) की बराबरी करने की अंधी दौड़ में ‘सच’ पीछे छूट जाता है. सनसनीखेज बनाने की होड़ में तथ्यों की पुष्टि किए बिना ही खबरें परोसी जा रही हैं, जिससे हिंदी पत्रकारिता के सिद्धांतों और उसकी साख को लगातार नुकसान पहुंच रहा है. व्यावसायिक दबावों और संपादकीय स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना आज हिंदी पत्रकारिता के सामने एक बड़ी चुनौती बन चुकी है.
अधिकतर मीडिया घरानों ने पत्रकारिता को लाभ कमाने वाला एक व्यवसाय बना दिया है. राजनीतिक हित साधने लगे हैं। टीआरपी और ज्यादा क्लिक्स पाने के लिए गंभीर मुद्दों को दरकिनार कर अंग्रेजी वालों की तरह सनसनीखेज और सतही खबरों को अधिक महत्व देने लगे हैं. इसके चलते कई बार खबरें निष्पक्ष नहीं लगती. सोशल मीडिया, यूट्यूब और एआई आधारित प्लेटफॉर्म्स ने समाचारों के उपयोग का तरीका पूरी तरह बदल दिया है. वेब पत्रकारिता की भाषा व्याकरण, वर्तनी और हिंदी के मूल स्वरूप को नष्ट करने लगी है. ऐसे में जहां हिंदी पत्रकारिता को मौजूदा नई चुनौतियों का विश्लेषण करने की जरूरत है, वही सरकार को भी हिंदी पत्रकारिता को पूर्ण अहमियत देनी होगी. तभी हिंदी पत्रकारिता को वह स्थान मिलेगा, जो उसकी जरूरत ही नहीं अधिकार भी है.

