उत्तर प्रदेश

ताकि कमजोर न पड़े लोकतंत्र का चौथा स्तंभ

जितेन्द्र बच्चन वरिष्ठ पत्रकार

उत्तर प्रदेश: मीडिया की स्वतंत्रता पर हमलों से रक्षा करने और पत्रकारों के बलिदान को श्रद्धांजलि देने के लिए हर वर्ष 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है. यह अलग बात है कि पक्ष-विपक्ष और सरकारी बाबू इसे महज एक खानापूर्ति समझते हैं. प्रेस की स्वतंत्रता के मूल सिद्धांतों का जश्न मनाना, मीडिया की स्वतंत्रता का मूल्यांकन करना और पत्रकारिता के दौरान जान गंवाने वाले पत्रकारों को याद करना तो दूर की बात, कई बार सरकार इस पर दो शब्द भी नहीं बोलती; इससे अधिक मीडिया की उपेक्षा और क्या हो सकती है.

इस बार विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस की थीम ‘पत्रकारिता: नई तकनीक (एआई) और मानवाधिकारों के समन्वय’ पर केंद्रित है. हमें बताना होगा कि स्वतंत्र पत्रकारिता कैसे सटीक जानकारी, जवाबदेही और पारदर्शिता के माध्यम से वैश्विक शांति और स्थिरता में योगदान देती है. एक स्वतंत्र और जिम्मेदार प्रेस लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, जो जनमत को आकार देने और सत्ता को जवाबदेह ठहराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इसमें कहीं चूक नहीं होनी चाहिए. पत्रकारिता जितनी ही जिम्मेदारी का कार्य है, उतना ही आपकी एक छोटी-सी भूल या चूक से लोगों का भरोसा आप पर से उठने लगता है. आप द्वारा दी गई गलत या भ्रामक जानकारी को एआई भी प्रसारित कर देता है, जो हमारे लिए एक बड़ी चुनौती है। हमें बहुत अधिक सावधान रहकर अपनी भूमिका निभानी है ताकि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कमजोर न पड़े.

यह सच है कि वर्तमान में निष्पक्ष पत्रकारिता करना बहुत कठिन है. इसके कारण लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के स्वरूप में बहुत बदलाव आ चुका है. आज पत्रकार अपनी पूर्ण स्वतंत्रता खोने पर मजबूर हैं. राजनीतिक दबाव, कॉर्पोरेट स्वामित्व, विज्ञापनों पर निर्भरता और भय व पक्षपात के कारण निष्पक्ष पत्रकारिता लगातार प्रभावित हो रही है. यहां तक कि विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में रैंकिंग में गिरावट (2023 में 161वीं) भी भारत के गंभीर खतरे को दर्शाती है। सत्ता का एक वर्ग लगातार मीडिया का परोक्ष या अप्ररोक्ष तरीके से फायदा उठा रहा है. आर्थिक लोभ में मीडिया का स्तर ही नहीं गिराता जा रहा है, बल्कि मीडिया संस्थानों पर सत्ताधारी दलों या बड़े व्यापारिक घरानों के प्रभाव से स्वतंत्र कवरेज सीमित हो जाती है. यह बहुत ही चिंताजनक है. कई मीडिया हाउस निष्पक्षता के बजाय एक विशेष एजेंडे या प्रोपेगंडा को बढ़ावा देते हैं. पत्रकारों को डराना-धमकाना, उन पर फर्जी मुकदमे दर्ज करना और हिंसा की घटनाएं स्वतंत्र पत्रकारिता की आजादी में बड़ी बाधा हैं. इसके अलावा विज्ञापनों के लिए सरकार या कॉरपोरेट्स पर निर्भरता के कारण सच को दबाया जाता है. तथ्यात्मक रिपोर्टिंग के स्थान पर विचारात्मक पत्रकारिता हावी हो गई है, जिससे विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं.

हालांकि, इन विपरीत परिस्थितियों में भी तमाम पत्रकार पूर्ण ईमानदारी और निष्पक्षता के साथ अपना काम कर रहे हैं. ऐसे पत्रकारों की संख्या कम जरूर हो सकती है लेकिन उन्हें खत्म नहीं किया जा सकता. लोग भी अब इस बात को समझने लगे हैं. जरूरत है सरकार के समझने की. सरकार को यह जानना होगा कि चंद पत्रकारों या कुछ मीडिया संस्थानों को आर्थिक प्रलोभन देकर गुलाम बनाने का खेल ज्यादा दिन नहीं चलेगा. आज नहीं तो कल, जब सच सामने आएगा तो उस सरकार को कोई नहीं बचा पाएगा और पीत पत्रकारिता करने वाले भी बेनकाब होंगे. इसलिए मीडिया को स्वतंत्र रखना अनिवार्य है, ताकि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कमजोर न पड़े.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *