सुशील कुमार शर्मा
नई दिल्ली: 5 सितंबर 2026 शिक्षक दिवस के अवसर पर रायबरेली के तारा निकेतन, ग्राम पूरे दूबे, सहजौरा में “सावित्री बाई फुले ग्रामीण शिक्षक सम्मान समारोह एवं परिचर्चा” का आयोजन किया गया. कार्यक्रम का विषय “ग्रामीण परिवेश में शिक्षा का महत्व” था. समारोह में ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के लिए योगदान देने वाले 34 शिक्षकों एवं शिक्षा से जुड़े व्यक्तित्वों को सावित्री बाई फुले ग्रामीण शिक्षक सम्मान से सम्मानित किया गया.
कार्यक्रम में अंतरराष्ट्रीय कवि एवं उत्तर प्रदेश साहित्य सभा के प्रधान सर्वेश अस्थाना मुख्य अतिथि रहे।कार्यक्रम की अध्यक्षता नवगीतकार डॉ. ओमप्रकाश सिंह ने की. इस अवसर पर बैसवारा शोध संस्थान के डॉ. हरनाम सिंह, शिक्षक संघ के प्रांतीय अध्यक्ष लल्लन मिश्रा, आयोजक कवि पंकज प्रसून, संयोजक नीरज शुक्ल सहित शिक्षा और साहित्य जगत से जुड़े अनेक लोग उपस्थित रहे.

कार्यक्रम के आयोजक कवि पंकज प्रसून ने ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों पर व्यंग्य करते हुए कहा कि प्राइमरी स्कूल की स्थिति ऐसी है कि वहां पढ़ना कोई नहीं चाहता, लेकिन पढ़ाना हर कोई चाहता है. कॉन्वेंट विद्यालय में शिक्षक तब तक ही पढ़ाता है, जब तक उसकी नौकरी प्राथमिक विद्यालय में नहीं लग जाती. उन्होंने कहा कि ग्रामीण शिक्षा को मजबूत किए बिना विकसित भारत का सपना पूरा नहीं हो सकता। गांव के विद्यालयों को केवल भवन और संसाधनों की दृष्टि से नहीं, बल्कि शिक्षक, गुणवत्ता और सामाजिक सम्मान के स्तर पर भी मजबूत करने की आवश्यकता है.
मुख्य अतिथि सर्वेश अस्थाना ने सावित्री बाई फुले के योगदान को याद करते हुए कहा कि सावित्री बाई फुले ने पुणे में पहला महिला विद्यालय खोलकर शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी पहल की थी. उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता है कि हम उनके विचारों और संघर्ष की राह पर चलें तथा शिक्षा को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का प्रयास करें. बैसवारा शोध संस्थान के डॉ. हरनाम सिंह ने शिक्षा के लगातार महंगा होते जाने पर चिंता व्यक्त की. उन्होंने कहा कि शिक्षा किसी परिवार की आर्थिक क्षमता का विषय नहीं, बल्कि प्रत्येक बच्चे का अधिकार होना चाहिए.

ग्रामीण और गरीब परिवारों के बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुलभ और किफायती बनाना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है. शिक्षक संघ के प्रांतीय अध्यक्ष लल्लन मिश्रा ने शिक्षकों की भूमिका और उनकी समस्याओं पर बात रखते हुए कहा कि ग्रामीण क्षेत्र का शिक्षक अनेक चुनौतियों के बीच बच्चों को शिक्षित करने का कार्य करता है. शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए शिक्षकों को सम्मान, आवश्यक संसाधन और अनुकूल कार्य वातावरण उपलब्ध कराया जाना जरूरी है। समारोह की अध्यक्षता कर रहे नवगीतकार डॉ. ओमप्रकाश सिंह ने कहा, सबसे पहले शिक्षक माता-पिता होते हैं. बिना संस्कारों के शिक्षा अधूरी है। उन्होंने कहा कि विद्यालय बच्चों को ज्ञान देता है, लेकिन उनके व्यक्तित्व और चरित्र की पहली पाठशाला घर ही होता है। इसलिए माता-पिता और शिक्षक दोनों को मिलकर बच्चों के भविष्य का निर्माण करना चाहिए.
समारोह में सम्मानित प्रमुख शिक्षकों एवं शिक्षा से जुड़े व्यक्तित्वों में डॉ. ओमप्रकाश सिंह, डॉ. महेन्द्र सिंह, तेजनारायण शुक्ल, हरिनारायण द्विवेदी, गंगा सहाय द्विवेदी, सुभाषचन्द्र त्रिपाठी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, सचिकान्त सिंह, मोन शेखर शुक्ल, मंगल वरुण सिंह, श्रीराम मास्टर, भगवान दीन लोधी, मो. जमी़ल हाजी, चन्द्रशेखर सिंह, डॉ. देवव्रत सिंह बैस, नीरज पाठेय, निर्मल श्रीवास्तव, सौरभ शुक्ल, गुड्डूदीन यादव, बजरंगी लाल, उदयराज सिंह, माता वरुण सिंह सहित अन्य शिक्षक शामिल रहे।इसके अलावा लल्लन मिश्रा, प्रांतीय अध्यक्ष शिक्षक संघ उत्तर प्रदेश, विद्यासागर, प्रबंधक जनता इंटर कॉलेज तथा सुनील सिंह, प्रबंधक बख्शी मेमोरियल को भी सम्मानित किया गया. कार्यक्रम का संयोजन नीरज शुक्ल ने किया तथा आयोजन कवि पंकज प्रसून के नेतृत्व में हुआ। कार्यक्रम को एसआर ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस, लखनऊ का सहयोग प्राप्त रहा.

