सुशील कुमार शर्मा
नई दिल्ली: वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) मुख्यालय, नई दिल्ली में हिंदी माह का शुभारंभ प्रसिद्ध कवि एवं साहित्यकार पंकज प्रसून के काव्य-पाठ से हुआ. शांति स्वरूप भटनागर सभागार में आयोजित कार्यक्रम में पंकज प्रसून की कविताओं को सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रोता उपस्थित रहे और सभागार हाउसफुल रहा. कार्यक्रम में सीएसआईआर के संयुक्त सचिव महेंद्र कुमार गुप्ता एवं उप सचिव श्रीमती अनीता सिंह की गरिमामयी उपस्थिति रही. पंकज प्रसून ने अपने विशिष्ट अंदाज में हास्य, व्यंग्य और समसामयिक विषयों से जुड़ी कविताएँ प्रस्तुत कीं. उनकी प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को खूब हंसाया और साथ ही सामाजिक एवं वैज्ञानिक विषयों पर सोचने के लिए भी प्रेरित किया.
इस अवसर पर पंकज प्रसून ने सीएसआईआर के संस्थापक महान वैज्ञानिक शांति स्वरूप भटनागर के साहित्यिक व्यक्तित्व का भी उल्लेख किया. उन्होंने बताया कि शांति स्वरूप भटनागर ने विज्ञान के साथ साहित्य और कविता के क्षेत्र में भी योगदान दिया था. उनकी कृति ‘लाजवंती’ वर्ष 1946 में प्रकाशित हुई थी, लेकिन वर्तमान में यह पुस्तक आउट ऑफ प्रिंट है. पंकज प्रसून ने सुझाव दिया कि सीएसआईआर द्वारा ‘लाजवंती’ का पुनर्प्रकाशन कराया जाना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी शांति स्वरूप भटनागर के वैज्ञानिक योगदान के साथ-साथ उनके साहित्यिक व्यक्तित्व से भी परिचित हो सके.

हिंदी माह के अंतर्गत आयोजित काव्य-पाठ प्रतियोगिता में 25 कवियों ने भाग लिया. पंकज प्रसून ने कवयित्री अर्चना द्विवेदी आर्य के साथ प्रतियोगिता के निर्णायक की भूमिका निभाई. कार्यक्रम के दौरान संयुक्त सचिव महेंद्र कुमार गुप्ता ने पंकज प्रसून की कविताओं की सराहना करते हुए कहा कि उनकी कविताएँ हंसाने के साथ-साथ सोचने के लिए भी मजबूर करती हैं. उन्होंने विज्ञान और साहित्य के इस सुंदर संगम को सराहनीय बताया. इस अवसर पर ‘विज्ञान प्रगति’ के संपादक डॉ. मनीष मोहन गोरे विशेष रूप से काव्य-पाठ सुनने पहुँचे.
अद्विक प्रकाशन के निदेशक अशोक गुप्ता ने सीएसआईआर के स्थानीय कवियों को पंकज प्रसून की पुस्तक ‘सच बोलना पाप है’ भेंट की. उल्लेखनीय है पंकज प्रसून पिछले 15 वर्षों से अधिक समय से सीएसआईआर की प्रतिष्ठित प्रयोगशाला केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (सीडीआरआई), लखनऊ से जुड़े हुए हैं. उन्होंने देश-विदेश के अनेक मंचों पर काव्य-पाठ किया है. उन्होंने कहा कि सीएसआईआर मुख्यालय के मंच पर काव्य-पाठ उनके लिए विशेष रूप से भावुक और यादगार अनुभव रहा. उनके अनुसार विज्ञान और कविता भले ही दो अलग-अलग रास्ते दिखाई देते हों, लेकिन इस आयोजन में दोनों एक ही मंच पर आकर एक-दूसरे से जुड़ गए.

कार्यक्रम को सफल बनाने में हिंदी विभाग के राजकुमार का विशेष योगदान रहा. उन्होंने कार्यक्रम की व्यवस्थाओं को व्यवस्थित एवं आत्मीयता के साथ संभाला.

