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अटल स्मृति व्याख्यान में वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सरदाना ने अटल संस्मरणों से किया मंत्रमुग्ध, राज्यपाल गुरमीत सिंह और मुख्यमंत्री पुष्कर धामी समारोह में रहे मौजूद - TV News Today
उत्तराखंड

अटल स्मृति व्याख्यान में वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सरदाना ने अटल संस्मरणों से किया मंत्रमुग्ध, राज्यपाल गुरमीत सिंह और मुख्यमंत्री पुष्कर धामी समारोह में रहे मौजूद

सुशील कुमार शर्मा

उत्तराखंड: कोई इंसान पीटता रहे लेकिन उसे रोने भी न दिया जाए, ऐसा नहीं होना चाहिए, उसे रोने का अधिकार तो मिलना ही चाहिए. फिर किसी बात को रटने से बात नहीं बनेगी उसे आत्मसात करने से ही जीवन सफल होगा. भारत रत्न और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के ऐसे ही कई संस्मरण सुनाकर वरिष्ठ पत्रकार और विचारक प्रदीप सरदाना ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया.

मौका था ‘अटल स्मृति व्याख्यान माला’ का. उत्तराखंड के राज्यपाल गुरमीत सिंह इस समारोह के मुख्य अतिथि थे तो उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर धामी अति विशिष्ट अतिथि के रूप में समारोह में मौजूद रहे. समारोह का आयोजन लेखक गाँव, देहरादून के संरक्षक रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ और ‘लेखक गाँव’ की निदेशक विदुषी ‘निशंक’ ने किया था.

अटल व्याख्यान माला के मुख्य वक्ता के रूप में अपने सम्बोधन में प्रदीप सरदाना ने वाजपेयी जी के साथ अपनी स्मृतियों और विचारों को साझा किया। श्री सरदाना ने कहा-‘’जब देश में नरसिंह राव प्रधानंत्री थे, लालकृष्ण आडवाणी भाजपा अध्यक्ष थे. साथ ही राम मंदिर के लिए की गई अपनी रथ यात्रा के बाद आडवाणी हिन्दू हृदय सम्राट बन चुके थे. तब यह सोचा भी नहीं जा सकता था कि अटल बिहारी वाजपेयी देश के अगले प्रधानमंत्री होंगे. लेकिन मैंने तब 30 अप्रैल 1995 के अपने अखबार ‘पुनर्वास’ की आवरण कथा में लिखा कि ‘’वाजपेयी प्रधानमंत्री बनेंगे’’. इस वार्षिकांक का विमोचन दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना ने किया तो वह यह शीर्षक देखकर चौंक कर बोले- ‘’यदि यह सच हो जाए तो आपके मुंह में घी शक्कर.

उधर जब मैंने यह अंक वाजपेयी जी को भेजा तो उन्होंने मुझे पत्र लिखकर जवाब दिया. साथ ही मुलाकात के दौरान कहा-‘’आपकी सद्दभावना के लिए आभारी हूँ. लेकिन यह कहाँ संभव हैं. मैं भला प्रधानमंत्री कैसे बन सकता हूँ.‘’ लेकिन आकलन सही निकला. मेरी इस कवर स्टोरी के ठीक एक बरस बाद वाजपेयी पहली बार प्रधानमंत्री बन गए। उसके बाद वह दो बार और प्रधानमंत्री बने। हालांकि मुझे घी शक्कर कभी नहीं मिला.‘’

इससे पूर्व जब 1977 में देश में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी तो उसमें वाजपेयी विदेश मंत्री थे. लेकिन तब चौधरी चरण सिंह जनता पार्टी से अलग हो कांग्रेस के साथ मिल गए. इससे जुलाई 1979 में मोरारजी देसाई की सरकार गिर गई और चरण सिंह प्रधानमंत्री बन गए. इसके बाद अटल जी से अपनी मुलाकात को याद कर प्रदीप सरदाना ने बताया तब वाजपेयी जी निराश हुए और उन्होंने अपने चिरपरिचित अंदाज में कहा-‘’चौधरी चरण सिंह ने लाल किले पर झंडा फहराने के लिए अपने साथियों की कमर में छुरा खोंप दिया.‘’

वाजपेयी जी की उस बात को भी उपस्थित जनसमूह ने काफी पसंद किया जिसमें बाल अटल ने अपने बाबा से यह सीख ली कि किसी का पिता भी उसे पीटे तो उसे रोने का अधिकार तो मिलना ही चाहिए. साथ ही अपनी माँ से उन्होंने सीखा कि कोई बात कहीं कहनी है या जीवन में उतारनी है तो उसे रटने से नहीं भली भांति समझना होगा.

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्र में मोदी सरकार में शिक्षा मंत्री रहे रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने वाजपेयी जी की प्रेरणा से ही देहरादून की मनोहर वादियों में ‘लेखक गाँव’ की स्थापना की थी. जबकि गत वर्ष अटल विहारी वाजपेयी की जन्म शताब्दी पर प्रथम ‘अटल स्मृति व्याख्यान माला’ का आरंभ किया गया. यह इस व्याख्यानमाला का दूसरा वर्ष है.

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