उत्तराखंड

हरिद्वार में नागा साधुओं ने होली को बनाया खास, सेलिब्रेशन में आस्था और परंपरा की गूंज, दिया ये संदेश

उत्तराखंड: फाल्गुन मास में रंगों और उल्लास के बीच धर्मनगरी हरिद्वार में संत समाज ने अनोखे अंदाज में होली मनाई. साधु संतों ने गाय के पंचगव्य से होली खेलकर सनातन परंपरा के निर्वहन के साथ ही पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया. साधु संतों ने माया देवी मंदिर प्रांगण में पहले गाय के दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र से पंचगव्य बनाया और फिर उसी से होली खेली. इस दौरान साधु संतों ने एक दूसरे को रंग लगाकर भी शुभकामनाएं दी. भजन कीर्तन और पारंपरिक जयघोष के बीच संत समाज ने उल्लासपूर्वक होली का उत्सव मनाया. साधु संत पारंपरिक ढोल नगाड़ों की धुन पर झूमते नजर आए. संत समाज की ओर से संदेश दिया गया कि त्यौहार केवल उत्सव का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और पर्यावरण चेतना का भी प्रतीक हैं.

जगद्गुरु शंकराचार्य राजराजेश्वराश्रम महाराज ने कहा कि भारतीय संस्कृति में प्राकृतिक संसाधनों के प्रति आदर की भावना सदैव रही है. पंचगव्य की होली उसी परंपरा का जीवंत उदाहरण है. इस होली के माध्यम से समाज को अपनी जड़ों से जुड़े रहने और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन जीने का संदेश दिया गया है.

Haridwar Juna Akhara

जूना अखाड़े के अंतरराष्ट्रीय संरक्षक श्रीमहंत हरिगिरि महाराज ने कहा कि होली का पर्व संत समाज को एक सूत्र में पिरोने का कार्य करता है. फागुन मास में पड़ने वाली रंग भरी एकादशी भगवान शिव और माता पार्वती को अर्पित होती है. उन्हें प्रसन्न करने के लिए पंचगव्य और रंगों से होली खेली जाती है. प्राचीन काल से साधु संतों के द्वारा गाय माता के पंचगव्य से होली खेलने की परंपरा चली आ रही है. बताया कि गाय के गोबर में भगवान गणेश का आह्वान हुआ था. इसका वैज्ञानिक महत्व भी है कि गोबर से कीटाणुओं का नाश होता है. इसलिए अखाड़ों ने होली खेलकर भगवान काशी विश्वनाथ की परम्परा का निर्वहन किया है.

इस अवसर पर अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत रविंद्रपुरी महाराज ने कहा कि पंचकव्य गोबर की होली हमारी सनातन संस्कृति का प्रतीक है. गाय को हिंदू धर्म में माता का दर्जा प्राप्त है और उसका गोबर भी पवित्र माना जाता है. उन्होंने कहा कि यह परंपरा प्रकृति के प्रति सम्मान और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती है. निश्चित रूप से इन परम्पराओं के निर्वहन से गाय माता को राष्ट्र माता का दर्जा भी मिलना चाहिए.

जूना अखाड़े और निरंजनी में नागा संन्यासी रहते हैं, जिन्हें सनातन धर्म और संस्कृति का वाहक माना गया है. जहां एक ओर बरसाना की लठमार होली और मथुरा की फूलों की होली देशभर में प्रसिद्ध है, वहीं इन साधुओं की होली में अलग ही उल्लास है. गाय से उत्सर्जन से बनी वस्तुओं और रंगों से पंचगव्य तैयार किया जाता है. जिसमें गंगाजल और रंग भी मिलाए जाते हैं. उसके बाद साधु संत पहले अबीर गुलाल लगाकर एक दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं और फिर पंचगव्य से होली खेलते हैं.

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