उत्तर प्रदेश: गाजियाबाद का जिला कारागार सिर्फ एक बंदी गृह नहीं बल्कि बंदी सुधार गृह में तब्दील हो रहा है. जेल के अंदर जहां कभी सन्नाटा और तनाव का माहौल रहता था. वहां अब रामचरितमानस, भगवत गीता का पाठ और भजन कीर्तन के स्वर गूंज रहे हैं. जेल प्रशासन का मानना है कि आध्यात्मिकता के माध्यम से जेल में मौजूद बंदियों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है. हर सुबह सूरज उगाने के साथ ही जेल परिसर में भजन कीर्तनों की गूंज शुरू हो जाती है. भक्ति रस में डूबे हुए बंदी हारमोनियम और ढोलक की ताल पर कीर्तन करते हैं.
गाजियाबाद जिला कारागार में सजायाफ्ता बुजुर्ग बंदियों द्वारा इस नई पहल की शुरुआत की गई है. बुजुर्ग बंदियों द्वारा जेल प्रशासन से अनुरोध किया गया था कि वह उम्र के आखिरी पड़ाव में धार्मिक कार्यों में लीन रहना चाहते हैं. बुजुर्ग बंदियों के अनुरोध को स्वीकार कर जेल प्रशासन ने उन्हें धार्मिक ग्रंथ उपलब्ध कराए. बुजुर्ग बंदियों द्वारा स्वेच्छा से समूह बनाकर भजन कीर्तन और पाठ करना शुरू किया गया. धीरे-धीरे अन्य बंदी भी मंडली में जुड़ते चले गए. प्रतिदिन जेल परिसर में रामचरित्र मानस और श्रीमद् भागवत गीता का नियमित पाठ होता है. मंगलवार और शनिवार को विशेष पाठ का आयोजन होता है. जिसमें बड़ी संख्या में बंदी शामिल होते हैं.

मंडली में मौजूद बुजुर्ग बंदी, अन्य बंदियों को न सिर्फ श्लोक का सही उच्चारण करना सिखाते हैं बल्कि श्लोक का अर्थ और जीवन में उनका प्रयोग करना भी समझाते हैं. जेल प्रशासन से मिली जानकारी के मुताबिक जेल में 70 साल से अधिक उम्र के तकरीबन 30 सजायाफ़्ता बंदी है. जेल में धार्मिक और आध्यात्मिक कार्यक्रमों से बंदियों के जीवन में कई सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं. इस तरह के कार्यक्रमों ने बंदियों के मानसिक भावनात्मक और व्यावहारिक सुधार लाने में अहम भूमिका निभाई है.
जेल प्रशासन के मुताबिक, जेल में कई बुजुर्ग बंदियों ने तो श्लोकों को कंठस्थ कर लिया है और बिना देखे ही पाठ किया करते हैं. इतना ही नहीं दूसरे लोगों को श्लोक के अर्थ के साथ जीवन में उनके प्रयोग के बारे में समझाते हैं.
वहीं जेल प्रशासन का मानना है कि इस तरह के कार्यक्रम शुरू होने के बाद बंदियों के बीच तनाव और आक्रोश की घटनाएं काफी हद तक कम हुई है. अधिकारियों का कहना है जब कोई व्यक्ति भीतर से बदलता है तभी वह समझ में लौटकर सकारात्मक योगदान दे सकता है. हमारा प्रयास है की जेल में मौजूद बंदी अपने समय का सदुपयोग कर अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सके और आत्मनिर्भर बन सके.
गाजियाबाद जिला कारागार अब एक मिसाल बनती जा रही है. जेल में हर तरह से बंदियों के जीवन में सुधार लाने के प्रयास किया जा रहे हैं. जेल से रिहा होने के बाद बंदी समाज में अपने आप को पुनः स्थापित कर सके. इसके लिए जेल परिसर में ही विभिन्न प्रकार के वोकेशनल ट्रेंनिंग कोर्सेज कराए जाते हैं. जिसमें कंप्यूटर कोर्सेज, टेलरिंग, होम डेकोर्स आइटम मेकिंग, हेयर ड्रेसर आदि कोर्सेज शामिल है. जेल प्रशासन का प्रयास है की जेल में रहने के दौरान बंदी विभिन्न प्रकार के कोर्सेज कर हनुमंत हों ताकि रिहाई के बाद आजीविका का साधन स्थापित कर आत्मनिर्भर बन सकें.
जेल परिसर में ही लाइब्रेरी मौजूद है जहां पर तकरीबन बीस हज़ार पुस्तक के मौजूद हैं. बंदी यहां से पढ़ने के लिए किताबें इशू कर सकते हैं इसके अतिरिक्त लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ाई कर सकते हैं. जेल प्रशासन का प्रयास है की जेल में मौजूद बंदियों को किन्हीं कार्यों में एंगेज रखा जाए जिससे कि उनके मन में किसी प्रकार के नकारात्मक विचार उत्पन्न ना हो और विभिन्न प्रकार की एक्टिविटीज में भाग लेकर खुद में आत्मविश्वास उत्पन्न कर सके.

