गाजियाबाद : योग शिक्षिका और प्राकृतिक चिकित्सक रेनू तेवतिया के नेतृत्व में गाजियाबाद से 17 योग साधिकाओं ने गत 4 अप्रैल को वाराणसी दर्शन के लिए प्रस्थान किया. 5 अप्रैल को वाराणसी पहुंचे इस ग्रुप में नेहरू नगर से योग शिक्षिका, रेकी मास्टर हीलर व प्राकृतिक चिकित्सक अर्चना शर्मा , कवि नगर से आरती सिन्हा, राजनगर एक्सटेंशन से शिक्षिका महिमा त्यागी, संयोगिता त्यागी,शांता अजय, ज्योति दीक्षित,अलका गुप्ता,मीनाक्षी त्यागी,अरुणा नय्यर, रीता त्यागी ,नंद ग्राम से बबीता, देहरादून से रेनू सिंह, मेरठ से कमलेश चौधरी , दिल्ली से उपासना त्यागी , नोएडा से सुनीता त्यागी व अवंतिका से शारदा त्यागी शामिल थे. रेनू तेवतिया ने बताया कि हमने विशेष रूप से वाराणसी में बनारसी साड़ियों को हाथ द्वारा कैसे बनाया जाता है यह भी अवलोकन किया. सिल्क की बनारसी साड़ियां किस तरह से अलग-अलग धागे लगाकर बनायी जाती हैं यह हमें वहां के कारीगरों ने बुनकर दिखाया.
योग शिक्षिका व नेचरोपैथ चिकित्सक अर्चना शर्मा ने बताया कि हमने सबसे पहले गंगा स्नान किया और नौका विहार के साथ-साथ सभी ने नौका में ही कुछ योग क्रियाएं भी की और घाटों का अवलोकन किया. उल्लेखनीय है यहां गंगा पर 88 घाट हैं. अधिकांश घाट स्नान और पूजा समारोह घाट हैं, जबकि दो घाटों का उपयोग विशेष रूप से श्मशान स्थलों के रूप में किया जाता हैं. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार गंगा नदी के तट पर पाँच प्रमुख घाट हैं, जो कि काशी के पवित्र शहर का अस्सी घाट, दशाश्वमेध घाट, मणिकर्णिका घाट, पंचगंगा घाट और आदिकेशव घाट की एक खासियत के साथ जुड़े होने के कारण महत्वपूर्ण हैं.

दशाश्वमेध घाट धार्मिक-सांस्कृतिक और ऐतिहासिक मान्यताओं के कारण इसकी गिनती काशी के सबसे प्रसिद्ध घाट में होती है. सभी ने शाम की आरती का आनंद लिया. अगले दिन सुबह सवेरे भोले बाबा विश्वनाथ जी का दर्शन करके सभी को बहुत अच्छा लगा. मान्यता है काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर बसी है. कहते हैं कि शिव को काशी से इतना प्रेम है कि उन्होंने भगवान विष्णु से धरती पर काशी को अपने निवास के लिए मांगा था. इसके बाद से भगवान शिव यहीं रहते हैं. यहां बाबा विश्वनाथ का बेहद प्राचीन ज्योतिर्लिंग है. इसके अतिरिक्त बनारस की प्रसिद्ध मंदिर संकट मोचन तुलसी मानस मंदिर दुर्गा मंदिर और बीएचयू में शिवलिंग का दर्शन किए.
वहां से यह दल मिर्जापुर जिले की प्रसिद्ध मां विंध्यवासिनी देवी के मंदिर गए. इस मंदिर का बड़ा ही रोचक इतिहास है. कहा जाता है कि जब मां विंध्यवासिनी मिर्जापुर से नाराज होकर यहां आईं तो खत्री पहाड़ ने मां का भार सहने से मना कर दिया. इस पर मां विंध्यवासिनी ने इसे श्राप दे दिया और यह पहाड़ कोढ़ी हो गया अर्थात आज भी पूरा सफेद है. मान्यता यह भी है कि मां विंध्यवासिनी अष्टमी और नवमी को यहां साक्षात विराजमान रहती हैं. नवरात्री में यहां हजारों दर्शनार्थियों की भीड़ लगती है.
विन्ध्य पर्वत पर विराजी अष्टभुजा श्री सिद्धिदात्री माता विंध्यवासिनी देवी, एक ऐसी आदिशक्ति हैं, जिनकी देवताओं ने भी आराधना की. जब-जब सृष्टि पर संकट आया तो महाशक्ति ने अनेकानेक रूप धर कर असुरों का नाश किया और विनाश से बचाया. उन्हीं मां विंध्यवासिनी का वास है बांदा के गिरवा क्षेत्र के खत्री पहाड़ में. ऐसी मान्यता है कि जब द्वापर में माता देवकी की संतानों को कंस वध कर रहा था. तब देवकी की आठवी संतान को बदल कर यशोदा की पुत्री को रख दिया गया था, लेकिन जब कंस ने उसे भी मारने का प्रयास किया तब वो आकाश में विलीन हो गयीं. वही कन्या मां विंध्यवासिनी हैं.
उसके पश्चात यह दल सारनाथ गया. सारनाथ गंगा और वरुणा नदियों के संगम के पास,वाराणसी से 10 किलोमीटर उत्तर पूर्व में स्थित एक स्थान है। बौद्ध परंपरा के अनुसार, सारनाथ वह स्थान है जहां लगभग 528 ईसा पूर्व, 35 वर्ष की आयु में गौतम बुद्ध ने बोधगया में ज्ञान प्राप्त करने के बाद अपना पहला उपदेश दिया था. भारत का राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ सारनाथ से लिया गया है. इस जगह पर आकर धम्मेक स्तूप के साथ इस 50 मीटर लम्बे स्तंभ को आज भी देखा जा सकता है. बौद्ध धर्म में अशोक स्तंभ का बेहद महत्व है. अशोक स्तंभ के अलावा यहां तिब्बती मंदिर और थाई मंदिर जैसी तमाम घूमने वाली जगहें हैं. सारनाथ में बौद्ध मंदिर में साधिकाओं ने मैडिटेशन किया. वहां की शांत और सकारात्मक ऊर्जा शरीर और मन को एक अद्भुत शांंति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान कर रही थी. इसके पश्चात स्वर्वेद महामंदिर में जहां पर 20000 व्यक्तियों के मेडिटेशन करने का स्थान बन रहा है वहीं पर सब ने सामूहिक रूप से लगभग 15 मिनट का मैडिटेशन किया. यह दल गत दिवस 8 अप्रैल को गाजियाबाद वापिस आ गया है.



