दिल्ली: पत्रकार लोकतंत्र का प्रहरी है, इसकी निष्पक्षता और प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए जरूरी है कि वह स्वयं भी विधि, प्रक्रिया और जवाबदेही के सर्वोच्च मानकों के प्रति प्रतिबद्ध हो.
पत्रकार अपने अधिकारों की रक्षा, सत्ता से स्वतंत्रता और कानूनी पुलिसिया दांवपेच से बचने के लिए समय-समय पर अपनी आवाज बुलंद करते रहते हैं. समाचार संकलन और लिखने- छापने की स्वतंत्रता के साथ-साथ पत्रकारों की रक्षा होनी भी जरूरी है। लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ जवाबदेही से मुक्ति नहीं हो सकता. स्वतंत्रता पत्रकारों को बाहरी दबाव से मुक्त होकर पत्रकारिता करने की ताकत देती है, जबकि जवाबदेही सुनिश्चित करती है कि उस शक्ति का प्रयोग निष्पक्षता और नैतिकता के अनुसार हो. एक पत्रकार के लिए भारतीय संविधान में भी यही व्यवस्था होनी चाहिए.
लेकिन ऐसा नहीं है कि गंभीर आचरण-संबंधी शिकायतों की जांच के लिए प्रभावी व्यवस्था की आवश्यकता ही समाप्त हो जाती है. अगर किसी पत्रकार की शिकायत पुलिस को मिलती है तो आंतरिक जांच और आपराधिक जांच उसके दायरे में शामिल हैं. हां, इसके बीच सीमाएं और कार्रवाई की परिस्थितियां अधिक स्पष्ट होनी चाहिए. कोई भी पत्रकार स्वयं को जांच-पड़ताल से ऊपर नहीं रख सकता पर इसका यह मतलब भी नहीं हैं कि कानूनी दांवपेच में फंसाकर एक पत्रकार को नर्क में धकेल दिया जाए. उसके मामले को मनगढ़ंत कहानी में बदलकर सार्वजनिक कर दिया जाए. शिकायतकर्ता की गोपनीयता, पत्रकार की प्रतिष्ठा, जांच की निष्पक्षता और प्रेस की आजादी, सभी का ध्यान रखना जरूरी है.
पत्रकारों की मांग है कि उन पर होने वाले हमलों और उत्पीड़न को रोकने के लिए देश और विभिन्न राज्यों में कड़ा ‘पत्रकार सुरक्षा कानून’ लागू किया जाए. यह मांग हम हरहाल में जायज मानते हैं. केंद्र की मोदी सरकार को इसे जल्द लागू कर देना चाहिए. लेकिन उसकी संरचना ऐसी होनी चाहिए, जिसमें पत्रकारों की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे, पुलिस की भूमिका संतुलित हो, कानूनी प्रक्रिया में पारदर्शिता आए और किसी एक जांच-पड़ताल करने वाली संस्था को अनुचित नियंत्रण प्राप्त न हो.
पत्रकारों को भी कानूनी प्रक्रिया का पूर्णतया पालन करना चाहिए, तभी उसकी स्वतंत्रता को अधिक विश्वसनीय बनाया जा सकेगा. पत्रकारिता के लिए जहां आजादी लोकतंत्र की मूल संरचना का महत्वपूर्ण तत्व है, वहीं पत्रकारों की जवाबदेही की व्यवस्था भी ऐसी होनी चाहिए, जो बाहरी नियंत्रण के बजाय स्वतंत्रता के भीतर उत्तरदायित्व सुनिश्चित करे. जैसे निराधार आरोपों से पत्रकारों की रक्षा जरूरी है, वैसे ही गंभीर व विश्वसनीय आरोपों की निष्पक्ष जांच भी आवश्यक है. इन दोनों के बीच संतुलन ही संवैधानिक गरिमा की वास्तविक कसौटी है.
आज आवश्यकता किसी पत्रकार या पत्रकारिता संस्थान को कटघरे में खड़ा करने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है, जिसमें पत्रकारों को लिखने व समाचार संकलन में पूर्ण स्वतंत्रता मिले और वह निष्पक्षता व जवाबदेही के साथ-साथ चले। क्योंकि यदि पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, तो उसकी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए जरूरी है कि वह स्वयं भी विधि, प्रक्रिया और जवाबदेही के सर्वोच्च मानकों के प्रति उतना ही प्रतिबद्ध हो, जितनी प्रतिबद्धता वह पुलिस, कानून और सरकार से अपेक्षा करता है. पत्रकारों की प्रतिष्ठा बचाने के लिए उनकी जवाबदेही भी सुनिश्चित होनी चाहिए। वह समाज का ही नहीं सरकार का भी विश्वसनीय संरक्षक है.
