दिल्‍ली-एनसीआर सुप्रसिद्ध प्रवासी साहित्यकार तेजेन्द्र शर्मा के कहानी संग्रह एवं संपादकीय संग्रह लोकार्पित
दिल्‍ली-एनसीआर

सुप्रसिद्ध प्रवासी साहित्यकार तेजेन्द्र शर्मा के कहानी संग्रह एवं संपादकीय संग्रह लोकार्पित

सुशील कुमार शर्मा

नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद एवं वैश्विक हिंदी परिवार द्वारा प्रवासी भवन, दीन दयाल उपाध्याय मार्ग में आयोजित विशेष साहित्यिक आयोजन में अद्विक पब्लिकेशन से प्रकाशित सुप्रसिद्ध प्रवासी साहित्यकार डॉ. तेजेन्द्र शर्मा के कहानी-संग्रह ‘बेबसी की दास्ताँ’ और पुरवाई में लिखे संपादकीयों के संग्रह ‘अपनी बात – खंड 6’ का लोकार्पण किया गया. कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. सच्चिदानंद जोशी के सानिध्य में हुई. मुख्य अतिथि के रूप में सुप्रसिद्ध कवि पद्मश्री अशोक चक्रधर उपस्थित रहे. इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि लेखराज , सान्निध्य में नारायण कुमार एवं अनिल जोशी तथा विशिष्ट वक्ता प्रो. सत्यकेतु सांकृत ने अपने विचार रखे। वैश्विक हिन्दी परिवार, दिल्ली के अध्यक्ष ऋषि कुमार ने संपूर्ण कार्यक्रम का कुशल संचालन किया.

समारोह के अध्यक्ष सच्चिदानंद जोशी ने ‘बेबसी की दास्ताँ’ पर अपनी टिप्पणी देते हुए कहा कि यह संग्रह सिर्फ़ बेबसी की दास्ताँ ही नहीं है, उम्मीदों का कारवाँ भी है. उन्होंने तेजेन्द्र शर्मा के सूक्ष्म अवलोकन की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस संग्रह से सीखना चाहिए कि कैसे बारीक से बारीक विवरण किसी कथानक को समृद्ध बनाते हैं. अपने जीवन के चिकित्सा जगत से जुड़े अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है कि अस्पताल का या चिकित्सक का अनुभव हमेशा बुरा ही हो. जीवन में कई बार ऐसा भी अनुभव आता है जब आपको मानवता के साक्षात दर्शन होते हैं. समारोह के मुख्य अतिथि प्रख्यात कवि एवं चिंतक पद्मश्री अशोक चक्रधर ने अपने अनूठे अंदाज़ में कहा, “तेजेन्द्र अकेले ऐसे प्रवासी लेखक हैं, जिनको उनके मूल देश भारत के पाठकों,साहित्यकारों, शैक्षिक संस्थानों के प्राध्यापक-छात्रों ने बहुत प्यार दिया है… शोधार्थियों ने सर्वाधिक. यहाँ आते हैं, प्यार पाते हैं तो उत्फुल्ल हो जाते हैं.

जो पाठक इनको पढ़ते हैं वे इनकी कहानियों में छिपे इनके शोध पर मुग्ध हो जाते हैं. शोधार्थी इनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व के क़ायल हो जाते हैं… तेजेन्द्र मुड़ कर नहीं देखते, आगे बढ़ते जाते हैं… नई चुनौतियां स्वीकार करते हुए नया कारनामा दिखाते हैं. ऐसा ही उनका नया कारनामा है, जिसका नाम है “बेबसी की दास्तां”। सूर्यकांत शर्मा कहते हैं चिकित्सीय पर्यटन, और डॉ. निखिल कौशिक कहते हैं – रोगियों और चिकित्सकों के लिये शब्द चित्र. तेजेन्द्र अपनी ओर से कुछ नहीं कहते बस अपनी दास्तानगोई में ग्यारह कहानियां परोस देते हैं, जो चिकित्सीय हैं और चिकित्सकीय हैं और ग्यारह घर-परिवारों की चिक उठा कर देखो, तो चिक-चिकीय के साथ प्रेम-रोगीय भी हैं… एवं अंततः बेबसीय नहीं रहतीं, चुंबकीय हो जाती हैं.

प्रो. सत्यकेतु साँकृत ने लोकार्पित कहानी संग्रह पर विशिष्ट टिप्पणी देते हुए कहा, “ तेजेन्द्र शर्मा प्रवासी साहित्य के ऐसे कथाकार हैं जिनकी कहानियां अपने अनोखे विषय वस्तु और नयेपन के कारण पाठकों की नई दुनिया तैयार करती हैं. उनका कहानी संग्रह बेबसी की दास्तां प्रवासी क्या हिंदी साहित्य का पहला ऐसा संग्रह है जो विभिन्न रोगों की त्रासदी पर केंद्रित है. ये कहानियां हैं तो रोगों पर केंद्रित लेकिन तेजेन्द्र शर्मा तमाम शारीरिक पीड़ाओं, मृत्यु-बोध, संत्रास के बीच प्रेम, मानवीय करुणा और अपनेपन का बीज बो देते हैं यही कारण है कि इन कहानियों के पात्रों की मनोदशा से गुजरते हुए भी हमारे अंदर प्रेम का भाव-बोध बचा रहता है. पहली कहानी ‘डायलिसिस’ की नायिका एक ऐसी युवती है जिसे बचपन से डायलिसिस दी जा रही है.

लंबे उपचार प्रक्रिया में युवा होते हुए उसे वहीं के एक व्यक्ति से प्रेम हो जाता है। यह प्रेम ही मृत्यु के साये में भी जीने की उम्मीद पैदा करता है. ‘कैंसर’ के मुख्य पात्र पूनम और नरेन का रिश्ता बीमारी, मानसिक और शारीरिक पीड़ा तथा मृत्यु की तमाम संभावनाओं के बीच प्रेम का रूप लेता है. तेजेन्द्र शर्मा ने यह साबित किया है कि रोग शरीर को कष्ट दे सकता है लेकिन आत्मा और हृदय को नहीं. प्रेम हमेशा उत्साह और उल्लास में नहीं होता दुःख में उपजे हुए प्रेम की उम्र लंबी होती है और उसकी संवेदना भी ठोस होती है. मुझे लगता है कि तेजेन्द्र शर्मा का यह कहानी संग्रह संत्रास में संबंध स्थापित करने के लिए याद किया जाएगा. पुस्तक चर्चा ‘हस्तक्षेप ‘ में भूमिका लेखक सूर्यकांत शर्मा ने पुस्तक पर सारगर्भित चर्चा की और इसे चिकित्सकीय विज्ञान – साहित्य – संस्कृति की जुगलबंदी कहा और यह आज की जेन -ज़ी, जेड और अल्फ़ा की चाहत के अनुसार पुस्तक है.

विशिष्ट अतिथि लेखराज ने पुस्तक प्रकाशन पर अपना हर्ष व्यक्त किया. विशिष्ट स्थिति और प्रवासी भवन के मुख्य नारायण कुमार ने प्रवासी भवन के इतिहास और हुए कार्यक्रमों के विषय में विस्तार से बताया. अनिल जोशी का वक्तव्य संवेदनशीलता और आपबीती से भरपूर रहा और श्रोताओं और गणमान्य अतिथियों को भिगो सा गया. प्रवासी पत्रकार और बेबसी की दास्ताँ के लेखक तेजेन्द्र शर्मा ने पुस्तक और कहानियों के सृजन पर अपने मन की बात कही और इस पुस्तक को शोधार्थियों को समर्पित करने पर अपने विचार प्रकट किए। उन्होंने अपनी रचना-प्रक्रिया भी अपने श्रोताओं के साथ साझा की.

इस अवसर पर व्यंग्य यात्रा के संपादक प्रेम जनमेजय भी उपस्थित रहे। इस लोकार्पण के दौरान एक रचनात्मक बातचीत भी हुई जिसमें सभी मंचासीन और उपस्थित जन ने उत्साह पूर्वक भाग लिया. अद्विक प्रकाशन के अशोक गुप्ता ने पुस्तक सृजन,प्रकाशन निर्णय और आज के परिवेश में स्वयं और संस्थान की भूमिका को भी सारगर्भित अंदाज़ में बयां किया. इस लोकार्पण में सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह भी रहा कि बड़ी संख्या में शोधार्थी, विद्यार्थी, युवा अध्यापक, राजभाषा अधिकारी भी पूरे समय उपस्थित रहे. साथ ही प्रो. गोपाल अरोड़ा , विनयशील चतुर्वेदी , कश्मीर से पधारीं कथाकार डॉ. मुक्ति शर्मा, कथाकार पीयूष श्रीवास्तव, डॉ. राजा राम यादव, शिव कुमार निगम एवं मनोज श्रीवास्तव ‘अनाम’, अनीता वर्मा, इला कुमार की गरिमामयी उपस्थिति रही।वहीं देश और विदेश से देश- विदेशी और प्रवासी गुणी जन भी इसके साक्षी रहे,कुछ विशेष नाम डॉक्टर निखिल कौशिक – सुप्रसिद्ध नेत्र विशेषज्ञ एवं साहित्यकार, यूके, प्रोफेसर किरण खन्ना, ऋतु ननन पाण्डेय, प्रो. सुषमा देवी, नीलिमा शर्मा, नीलिमा करैया, पद्मा मिश्रा सरीखे लेखक और सृजक श्रोता दीर्घा ऑनलाइन मौजूद रहे.

Exit mobile version