उत्तराखंड: राजनीति में ‘भगत दा’ के नाम से पहचान रखने वाले वरिष्ठ नेता, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया है. भगत दा के इतिहास पर नजर डालें तो उनका जीवन काफी चुनौतीपूर्ण रहा है. आज भगत दा के साथ-साथ उत्तराखंड की उन हस्तियों के बारे में भी आपको बताते हैं, जिन्होंने देवभूमि का नाम रोशन किया और पद्म भूषण जैसा सम्मान हासिल किया.
भगत सिंह कोश्यारी ने पहाड़ के एक साधारण परिवार से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनाई. उत्तराखंड के राजनीतिक इतिहास में भगत सिंह कोश्यारी का नाम उन नेताओं में लिया जाता है, जिन्होंने संगठन, विचारधारा और जनसंवाद के बल पर अपनी अलग छवि बनाई. भगत सिंह कोश्यारी का जीवन उत्तराखंड की सामाजिक और राजनीतिक चेतना का एक बड़ा अध्याय माना जाता है.
आदरणीय राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु जी द्वारा राष्ट्र निर्माण, शिक्षा, जनसेवा और उत्तराखण्ड की अस्मिता को सशक्त स्वर देने वाले प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल आदरणीय श्री @BSKoshyari जी को प्रतिष्ठित पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किए जाने पर… pic.twitter.com/LeJ0B1TI9G
— Pushkar Singh Dhami (@pushkardhami) May 25, 2026
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान भगत सिंह कोश्यारी उन प्रमुख चेहरों में शामिल रहे, जिन्होंने अलग राज्य की मांग को मजबूती से राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया. पहाड़ की भौगोलिक कठिनाइयां, पलायन, बेरोजगारी और विकास की समस्याओं को उन्होंने लगातार राजनीतिक मुद्दा बनाया.
आंदोलन के दिनों में वे गांव-गांव जाकर लोगों को जागरुक करते रहे. बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट की मानें तो उत्तराखंड आंदोलन के वैचारिक आधार को मजबूत करने में भगत दा की महत्वपूर्ण भूमिका रही. राज्य निर्माण के बाद उत्तराखंड की राजनीति में उनकी पकड़ और मजबूत होती चली गई. वे संगठन के ऐसे नेता माने गए, जो कार्यकर्ताओं के बीच सीधा संवाद करते थे. भाजपा संगठन को पहाड़ के दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंचाने में भी उनका बड़ा योगदान माना जाता है. यही कारण है कि आज भी उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में उन्हें सम्मान के साथ याद किया जाता है.
मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने पर्वतीय क्षेत्रों के विकास, सड़क, शिक्षा और ग्रामीण ढांचे को मजबूत करने पर जोर दिया. वे अक्सर बिना किसी बड़े काफिले और औपचारिकता के सीधे जनता के बीच पहुंच जाते थे. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भगत दा की सबसे बड़ी ताकत उनका जनसंपर्क रहा. वे भाषणों से ज्यादा संवाद की राजनीति में विश्वास रखते थे. यही वजह रही कि भाजपा संगठन के भीतर भी उन्हें एक सहज और जमीन से जुड़े नेता के रूप में देखा गया.
भगत सिंह कोश्यारी महाराष्ट्र के राज्यपाल भी रहे हैं. 5 सितंबर 2019 को उन्हें महाराष्ट्र के राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया गया था. महाराष्ट्र जैसे बड़े और राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में उनकी नियुक्ति भाजपा नेतृत्व के भरोसे को दर्शाती थी. राज्यपाल के रूप में उनका कार्यकाल कई बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों का गवाह बना. महाराष्ट्र की सत्ता को लेकर हुए घटनाक्रमों के दौरान उनके फैसलों पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस भी हुई. हालांकि, कई मौकों पर विपक्ष ने उनके कुछ बयानों और फैसलों को लेकर आलोचना भी की. इसके अलावा अगस्त 2020 में कोश्यारी को गोवा के राज्यपाल का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया था.
