उत्तर प्रदेश गाजियाबाद में 50 एकड़ भूमि पर विकसित होगा ‘मिनी फॉरेस्ट’, मियावाकी तकनीक से लगेंगे 7 लाख पौधे
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गाजियाबाद में 50 एकड़ भूमि पर विकसित होगा ‘मिनी फॉरेस्ट’, मियावाकी तकनीक से लगेंगे 7 लाख पौधे

गाजियाबाद: विजयनगर इलाके में स्थित शीशम ग्राउंड में लगभग 50 एकड़ में फैली सेना की भूमि है. यह स्थान लंबे समय से खाली पड़ा हुआ था, लेकिन अब इसे एक हरित क्रांति के केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है. नगर निगम की योजना के अनुसार 50 एकड़ की भूमि में लगभग 7 लाख पौधे लगाए जाएंगे. इसमें से 10 एकड़ के क्षेत्र में एक लाख पौधे लगाए जा रहे हैं, जबकि शेष 40 एकड़ की भूमि में तकरीबन 6 लाख पौधों को रोपा किया जाएगा. नगर निगम में 50 एकड़ की इस भूमि को मिनी फॉरेस्ट के रूप में विकसित करने का लक्ष्य रखा है. आने वाले दिनों में यह मिनी फॉरेस्ट न सिर्फ ऑक्सीजन का स्रोत बनेगा, बल्कि स्थानीय तापमान और प्रदूषण को भी नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाएगा.

गाजियाबाद नगर निगम के उद्यान विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक, मियावाकी तकनीक से विकसित होने वाले मिनी फॉरेस्ट में लगभग 50 एकड़ की भूमि में 270 प्रजातियों के पौधे रोपित किया जा रहे हैं. इसमें फलदार पौधे, औषधीय पौधे और अधिक मात्रा में ऑक्सीजन देने वाले वृक्ष शामिल हैं. जब एक ही स्थान पर विभिन्न प्रकार की प्रजातियों के पौधों का रोपण किया जाता है तो वह आपस में प्राकृतिक संतुलन बनाते हैं. कुछ पौधे छाया प्रदान करते हैं तो कुछ मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं और कुछ हवा को शुद्ध करते हैं. मियावाकी तकनीक में पौधे एक दूसरे के सहायक बनते हैं, जिससे जंगल तेजी से विकसित होता है

मियावाकी तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी घनत्व और संरचना है, सामान्य वृक्षरोपण में एक पौधे से दूसरे पौधे के बीच 4 से 5 मीटर की दूरी रखी जाती है जबकि मियावाकी तकनीक में प्रति वर्ग मीटर लगभग 3 पौधे लगाए जाते हैं. इस तकनीक में पौधों को तीन स्तरों पर विभाजित किया जाता है. पहले मुख्य वृक्ष जिसे कैनोपी ट्री बोलते हैं. दूसरा सब ट्री और तीसरा झाड़ियां, इन तीनों स्तरों को एक साथ लगाया जाता है. जिससे जंगल की प्राकृतिक संरचना तैयार होती है. शुरुआती 2 सालों तक इन पौधों की विशेष देखभाल की जाती है, जिसमें पानी देना, खर पतवार हटाना और मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखना शामिल होता है. इसके बाद पौधे खुद एक दूसरे के सहारे विकसित होने लगते हैं और दो से तीन साल में मिनिमम विकसित हो जाता है.

गाजियाबाद में इससे पहले भी जिले में 7 स्थान पर मियावाकी तकनीक से मिनी फॉरेस्ट विकसित किया जा चुके हैं. कुल मिलाकर मियावाकी तकनीक शहरी क्षेत्र के लिए बेहद प्रभावी साबित हुई है, पहले बने जंगलों में देखा गया है कि कुछ वर्षों में घना जंगल विकसित हो गया, जहां पहले खाली जमीन हुआ करती थी, जिससे कि पक्षियों की वापसी होने के साथ हवा की गुणवत्ता में सुधार हुआ और और तापमान में भी कमी आई.

गाजियाबाद नगर निगम के उद्यान अधिकारी डॉ अनुज का कहना है कि पहले भी नगर निगम द्वारा कई मिनी फॉरेस्ट मियावाकी तकनीक से विकसित की जा चुके हैं. लगभग 2 साल में 10 से 12 फीट तक पेड़ों की ऊंचाई पहुंच जाती है. हमें उम्मीद है कि विजयनगर में मिनी फॉरेस्ट विकसित होने के बाद गाजियाबाद के प्रदूषण स्तर में भी कभी आएगी. 7 लाख पौधे जब पेड़ का रूप लेंगे तो बड़े स्तर पर हवा को शुद्ध करने का काम करेंगे महीने भर में पौधारोपण को पूर्ण करने का लक्ष्य रखा गया है.

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