दिल्ली: जंतर-मंतर पर अभी स्टूडेंट्स और एक्टिविस्ट्स का प्रोटेस्ट चल रहा है. इसी मुद्दे को लेकर जाने-माने सोशल एक्टिविस्ट अन्ना हजारे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की है.
अन्ना हजारे के लेटर में क्या लिखा है? प्रधानमंत्री को लिखे लेटर में अन्ना हजारे ने कहा, ‘नई दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के बीच मंगलवार को हुई हिंसा और पुलिस एक्शन की खबर बहुत दुख देने वाली है. एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसी घटनाएं किसी के भी हित में नहीं हैं. हिंसा, पब्लिक प्रॉपर्टी को नुकसान पहुंचाना, या बहुत ज़्यादा बल का इस्तेमाल हर कीमत पर टाला जाना चाहिए.
आज देश भर में लाखों युवा पेपर लीक, भर्ती प्रोसेस में देरी, बेरोजगारी और दूसरी कई चिंताओं की वजह से बेचैन है. इस अशांति को सिर्फ कानून-व्यवस्था के मुद्दे के तौर पर नहीं, बल्कि समाज के अंदर के दर्द और उम्मीदों की झलक के तौर पर देखना जरूरी है.
इससे पहले 2024 में नीट एग्जाम पेपर लीक को लेकर विवाद सामने आया था. इस साल भी पेपर तब लीक हुआ जब 22 लाख स्टूडेंट्स एग्जाम दे रहे थे. निराशा में आकर 22 स्टूडेंट्स ने सुसाइड कर लिया. री-एग्जाम रिजल्ट में बड़ी गड़बड़ियों की भी रिपोर्ट सामने आई. जब भी एडमिनिस्ट्रेटिव मिसमैनेजमेंट सामने आता है, तो सरकार का अपने मातहतों पर दोष मढ़ना और किसी भी सफलता का क्रेडिट लेना गलत है.’
पिछले 25 दिनों से स्टूडेंट्स और पेरेंट्स शांति से सड़कों पर प्रोटेस्ट कर रहे हैं और मिनिस्टर के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं. जवाबदेही के आधार पर मिनिस्टर का इस्तीफा मांगने से सरकार की पावर नहीं जाएगी, बल्कि, इससे दूसरे मिनिस्टर्स को यह मैसेज जाएगा कि अपने डिपार्टमेंट्स को ठीक से मैनेज न कर पाने पर उन्हें ऑफिस से हटाया जा सकता है.
नतीजतन इससे असल में सरकार के ओवरऑल कामकाज में सुधार होगा. सोनम वांगचुक को प्रोटेस्ट साइट से जबरदस्ती हटाने से पहले सरकार ने उनसे कोई बातचीत नहीं की. यह गलत है कि दिल्ली में इतने लंबे समय से भूख हड़ताल जारी रहने के बावजूद, सरकार ने किसी भी रिप्रेजेंटेटिव या सेक्रेटरी लेवल के अधिकारी को प्रोटेस्टर्स से बात करने की जरूरत नहीं समझी.
लोकतंत्र में बातचीत हमेशा टकराव से बेहतर रास्ता होती है. लोगों की आवाज को सिर्फ विपक्ष की आवाज नहीं समझना चाहिए. प्रोटेस्ट करने वाले भी हमारे देश के नागरिक हैं. हजारे ने कहा कि डेमोक्रेसी की असली परीक्षा शांति से उनकी बातें सुनने, भरोसे का माहौल बनाने और कंस्ट्रक्टिव बातचीत के जरिए आगे का रास्ता खोजने में है.
