उत्तर प्रदेश: माघ मेले के दौरान बुधवार तड़के संगम की रेती पर अजब हठयोग दिखा. संगम की रेती पर स्वामी अभय चैतन्य फलाहारी उर्फ मौनी बाबा ने 1644वीं दंडवत परिक्रमा पूरी की. शंखों और घंटा घड़ियाल की धुनों पर हर हर महादेव के उद्घोष के साथ मौनी बाबा लेटकर लुढ़कते हुए संगम पहुंचे. माघ मेले में मौनी बाबा ने संगम अपर मार्ग सेक्टर-2 में 5.51 करोड़ रुद्राक्षों से 12 भव्य ज्योतिर्लिंगों की रचना की है. 11 फीट ऊंचे इन शिवलिंगों पर 7 करोड़ रुद्राक्ष मालाएं अर्पित की गई हैं. मौनी बाबा ने बताया कि यहां संगम की रेती पर, अक्षयवट की छाया में और भारद्वाज मुनि की तपस्थली पर दिव्य ज्योर्तिलिंग का निर्माण किया गया है.
सामान्य दिनों में शरीर पर 40 किलो वजन के 33 हजार रुद्राक्ष धारण करने वाले स्वामी अभय चैतन्य फलाहारी, जिन्हें श्रद्धालु मौनी बाबा के नाम से जानते हैं, बीते कई सालों से मौन, तप और दंडवत परिक्रमा के कठिन मार्ग पर चल रहे हैं. 14 सालों के कठोर मौन व्रत के बाद बोलने वाले मौनी बाबा आज भी संयमित शब्दों और संकेतों के जरिए बात करते हैं. देश और समाज कल्याण के लिए उनका जीवन त्याग, तप और अनुशासन का प्रतीक है.
मौनी बाबा ने बताया कि यहां संगम की रेती पर, अक्षयवट की छाया में और भारद्वाज मुनि की तपस्थली पर दिव्य ज्योर्तिलिंग का निर्माण किया गया है. ज्यार्तिलिंग 11 फीट ऊंची, 9 फीट चौड़ी और इसका व्यास 7 फीट है. इस ज्योर्तिंग के चारो तरफ 11,108 त्रिशूलों की स्थापना की गई है. इनके अलग-अलग रंग हैं और उनका अलग-अलग मकसद है. इनकी स्थापना अभिमंत्रित मंत्रों के साथ आतंकवाद, महामारी और नकारात्मक शक्तियों के विरुद्ध आध्यात्मिक कवच तैयार कराने के लिए किया गया है.
दक्षिण दिशा में स्थापित काला त्रिशूल आतंकवाद विनाश के लिए और बांग्लादेशी हिंदुओं की सुरक्षा और मारे गए हिंदुओं की आत्मा की शांति के लिए स्थापित किया गया है. लाल त्रिशूल देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए, विदेशी आक्रांताओं से देश कमजोर न हो इसके लिए स्थापित किया गया है. पूर्व दिशा में पीला त्रिशूल राष्ट्र रक्षा के संकल्प को दर्शाता है. पश्चिम दिशा में श्वेत त्रिशूल ज्ञान और विद्या का प्रतीक माना गया है. इसके साथ ही मंगल, श्री, अनुग्रह और कृपा के प्रतीक चार विशेष त्रिशूल भी स्थापित किए गए हैं.
माघ मेले में आने वाले श्रद्धालु मौनी बाबा की साधना को देखकर न केवल आस्था से भर रहे हैं, बल्कि संयम, अनुशासन और सेवा के भाव से भी जुड़ रहे हैं. कई श्रद्धालु इसे सनातन संस्कृति का जीवंत पाठ मानते हैं, जहां शब्दों से ज्यादा तप और कर्म बोलते हैं. संगम स्नान करने आए रामसुख द्विवेदी कहते हैं कि मौनी बाबा ने संगम रेती को एक आध्यात्मिक ‘रुद्राक्ष लोक’ में परिवर्तित कर दिया है, जहां आस्था, तप और संकल्प एक साथ साकार होते दिखाई देते हैं.
