उत्तर प्रदेश: महाकुंभ मेले में साधु-संन्यासियों के साथ रुद्राक्ष की भी खूब चर्चा है. महाकुंभ नागा-संन्यासी अपने शरीर पर हजारों रुद्राक्ष पहनकर घूम रहे हैं. रुद्राक्ष वाले बाबा की भी खूब चर्चा है. यहां 7 करोड़ से ज्यादा रुद्राक्ष के दानों और मालाओं से भव्य द्वादश ज्योतिर्लिंग का निर्माण किया गया है. यहां से रुद्राक्ष बांटकर भक्तों को बाबा आशीर्वाद भी दे रहे हैं. यह सब देख रुद्राक्ष की डिमांड भी लोगों के बीच खूब है. यही वजह है कि मेले में पटरी दुकानों, साधु संतों के शिविरों के बाहर रुद्राक्ष और रुद्राक्ष की मालाएं बिक रही हैं.
पौराणिक कथाओं के अनुसार रुद्राक्ष को भगवान शिव के वरदान के रूप में माना जाता है. कथाओं के मुताबिक रुद्राक्ष का अर्थ ही होता है भगवान शिव के आंसुओं से उत्पन्न एक ऐसा फल जो रुद्र रूप में जाना जाता है. जिसे रुद्राक्ष कहते हैं. ऐसी मान्यता है कि हजारों वर्षों तक आंखें बंद करके ध्यान में बैठे शिव की आंखों से निकलने वाले आंसू से उत्पन्न हुआ रुद्राक्ष साक्षात शिव है. आमतौर पर रुद्राक्ष की माला नागा साधु और संन्यासियों के गले में ज्यादा दिखाई देती है.
शिव नगरी पूरी तरह से रुद्राक्ष की माला से बनी दुनिया की पहली नगरी है. 12 ज्योतिर्लिंग को बहुत सोच-समझकर अपनी-अपनी जगह पर रखा गया है जिनमें छह उत्तर की ओर और छह दक्षिण की ओर हैं. महाकाल शिवलिंग दुनियाभर में ऐसा इकलौता शिवलिंग है जिसका मुख दक्षिण की ओर है. ये उसके आध्यात्मिक महत्व को बढ़ाता है.
बाबा के अनुसार, रुद्राक्ष की माला को पवित्र माना जाता है और उनकी दिव्य क्षमता को उजागर करने के लिए प्राण प्रतिष्ठा अनुष्ठान की जरूरत होती है. इसके अलावा, बाबा ने अलग-अलग तरह के रुद्राक्ष के लाभों के बारे में भी बताया. आठ और नौ मुखी रुद्राक्ष समृद्धि लेकर आते हैं, जिससे घर में देवी लक्ष्मी आती हैं. जबकि दस और ग्यारह मुखी मोती करियर में सफलता बढ़ाने वाले माने जाते हैं. उन्होंने बताया कि शिव नगरी न केवल रुद्राक्ष के आध्यात्मिक और औषधीय महत्व को दर्शाती है, बल्कि इन मोतियों से जुड़े मिथकों को भी दूर करती है। महाकुंभ आने वाले हर श्रद्धालु को एक बार शिव नगरी स्थल पर जरूर जाना चाहिए.
